मनुष्य सूअर के जैसे जीवन जी रहा है और सूअर होने के लिए गधे जैसा काम कर रहा है .


मनुष्य सूअर के जैसे जीवन जी रहा है और सूअर होने के लिए गधे जैसा काम कर रहा है .
So the whole civilization at the present moment they want to live like pig, and to live like pig they are working like an ass. And that is civilization, working like ass to become a pig. You tell them

जिनको जिज्ञासा अधिक हो वो नीचे श्रीला प्रभुपाद का पूरा किस्सा पढ़ लें और गधे सूअर की फोटू भी देख लें . ये कॉपी करा है पोस्ट मगर बाकी अभिव्यक्ति मेरी है .इसके लिए और किसी को गाली न दी जाय .

एक दिन अचानक ही फेसबुक पे ये पोस्ट आयी थी , मैं वैसे भी सोचता रहता हूँ की क्यों है जो कुछ भी है और ऐसा ही क्यों है ....और ऐसा होने से हो क्या जायेगा ? कुछ दिन महीनों से अजीब सा हो ही रहा है ....प्रभु ने दिल्ली भेजा ....यहाँ देखा की हर आदमी नकली है .....दिखावा के अलावा कुछ भी नहीं ....स्वार्थ ....अहंकार .....नीचता ....सूअर के जीवन के लिए गधे जैसे मरे जा रहा है काम कर कर के .....और रत्ती भर भी क्लेश नहीं ऐसा होने का !!! ....सुबह से शाम तक झूठ फरेब और कुछ भी नहीं ......

अभी एक स्वाध्याय आश्रम जाना हुआ जहां पर प्राकृतिक जीवन जीना पड़ता है ...उबली सब्जी और १ रोटी दिन में और साथ में कभी छाछ कभी दूध .....बस . मगर इसमें आनंद इतना आया जो आजतक किसी पांच सितारा के भोजन में भी नहीं आया .
आखिर हम खाने के बाद करते क्या है ?
हम उसे हग देते हैं . ऐसा करने वाले सिर्फ हम ही नहीं हैं .....सारा प्राणी जगत ही येही करता है . खाता है टट्टी करता है .पैदा होता है मर जाता है .
                 पैदा होना सोना जागना खाना हगना मर जाना.
मूलभूत रूप से येही प्राणी जगत की मूल क्रिया है. कुत्ता बिल्ली मनुष्य अमीबा परमेशीइम आदि . तो कुछ दिनों से मजेदार चीज़ें हो रही थीं.

आमिर खान की पिक्चर आयी पीके . बड़ा बवाल हुआ और हो रहा है . किसी ने यह नहीं देखा की एक द्रश्य में आमिर खान पूछता है की “ठप्पा कहाँ है “ बच्चे की पोंद उठा कर . तो उसे कहीं ठप्पा नहीं दीखता. येही उस फिल्म की मूल भावना है .मगर किस बात को कहाँ ले जाया गया .इसी ठप्पे के कारण मुझे भी बुरा लगा हिन्दू लड़की का पाकिस्तानी लड़के से प्यार करना और उससे भी बुरा वोह प्यार सच्चा हो जाना . क्योंकि हम सब ठप्पे लगवा चुके हैं . स्वार्थ के ...घृणा के ....धर्म के ...इर्ष्या के ....जो दीखते नहीं है मगर बहुत अन्दर तक उनके निशाँ रहते हैं .....और समय के साथ बाहर आ जाते हैं ....इस फिल्म में मैंने देखा की लोग तालियाँ बजा रहे थे ...जिनको सिनेमा  घर के बाहर नहीं मिला वोह इसे अन्दर पाकर खुश हो रहे थे ...और कोई बात नहीं है ....

जो हमारे पास नहीं होता वोही हम दूसरों में ढूँढ़ते हैं ....और मिल जाने पर या तो खुश होते हैं या इर्ष्या से भर जाते हैं ..इस फिल्म में दोनों ही बातें होती हैं ....अधिकतर लोगों के साथ ...


आज फ्रांस में मुसलामानों ने १२ लोगों को कार्टून के कारण गोली मार दी क्योंकि वोह कार्टून उनके धर्म का उपहास कर रहा था . जिसने भी यह करा वह प्रशंसा का पात्र है . क्योंकि मीडिया की स्वतंत्रता का मतलब ये नहीं हो सकता की आप किसी के धर्म और देवता का उपहास बनाइये . कल को आप लोगों की माँ बहिन बाप भाई पे भी उतर आयेंगे . ऐसी स्वतंत्रता किसी काम की नहीं . मेरी शुभकामनाएं उन लोगों को जिन्होंने यह कार्य करा. मेरी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है आखिरकार. कोई मेरे देवी देवता का अपमान करे और मेरे पास हथियार हों तो मैं भी वोही करूँगा . मैं राजनीतिग्य नहीं जो राम रहीम सबको बेच खाऊ और बाद में बोलूं की एक चेक एक ही बार केश होता है .
               सामान्य इंसान हूँ . हिन्दू के ठप्पे वाला.
चिरकीन कोई था या नहीं था पता नहीं पर टट्टी पर उसकी बहुत कविता आदि हैं .....आप मैं अमरीका का राष्ट्रपति या बघ्दादी या दवूद या हाफिज सईद या कोई भी .....सभी हग रहे हैं ....जो खाया है ....टट्टी अवशेष और अपशिष्ट होती है .....सत्व निचुड़ जाने के बाद बचा हुआ कचरा शरीर से निकल जाने की प्रक्रिया हगना है .....तो बहुत बार अपच हो जाती है और सब कुछ मुह से या नीचे से निकल जाता है .....

आजकल नेता लोग मुह से भी टट्टी करने लगे हैं किसी भी धर्म के हों ...वोह बताना चाह रहे हैं की देखो हम जब मुह से इतनी घिनी बात कर सकते हैं तो हमारे पखाने की तो बात ही क्या होगी ....संडास के कीड़े मकोड़े उसकी बदबू से वैसे ही मर जाते होंगे ....हम कुछ भी हजम नहीं करते उल्टा उसको और गन्दा करके मुह से ही बाहर फेंक देते हैं ....

तो दिल्ली में मैंने देखा की बड़ी बड़ी गाड़ियां है ....३ लोग ९  गाड़ियां ...रोज़ जाम लगता है ....लोग लोगों को गालियाँ बकते हैं ..खुद को नहीं देखते ..... अस्पताल जाना हुआ अभी एक ..वहाँ देखा की लोग ऐसे आते हैं कैसे फैशन शो में आ रहे हों ....बड़े अस्पताल अब अस्पताल कम ....टकसाल ज्यादा हो गए हैं ....क्या चुतियापा है समझ के बाहर है ....एक दिन साले सब मर जायेंगे ....फिर भी इच्छा नहीं मर पा रही है ...मोटा पतला लूला लंगड़ा अँधा बहरा सभी अपने आप को अमिताभ रेखा बनाने पर तुले हुए हैं इन अस्पतालों में ....

तो आखिर हम जिंदा क्यों हैं ? इतने सालों में एक बात तो साफ़ समझ में आती है की कम से कम पैसे घर गाडी के लिए भगवान् ने जन्म नहीं दिया ....मैं हूँ या अनिल अम्बानी ..जाना राख में ही है ..फिर किस मतलब का हज्जारों करोड़ रुप्यापैसा ??? मैय्यत में भले करोड़ लोग आएँ या कुत्ता भी न आये ....होना तो राख ही है ...और क्या फर्क पड़ता है मरने के बाद ....कोई नाम ले या ना ले ..वोह भी तो मोह ही है की मरने का बाद भी मेरा नाम रहे .............
क्यों रहे ? किसी नाम से क्या उखाड़ लिया आज तक किसी ने ?

कभी कभी लोग वैसे ही अच्छे लगने लगते हैं ..मन को भाने लगते हैं ....उनसे बात करो तो अच्छा लगता है ....ऐसा मेरे साथ हुआ ..किसी ने कभी भविष्य पूछा था.....ये भी क्या नौटंकी है ..ये भी ख़तम होना है एक दिन ....

बड़ा सवाल ये है की जब सब ख़त्म होना ही है तो हम हुए ही क्यों और वोही क्यों हुए जो हैं ...और कुछ क्यों नहीं ..और सब ख़त्म होने के बाद क्या रह जाएगा ???? जब कुछ रह ही नहीं जाना है और कुछ भी कुछ भी नहीं है तो जो भी है वोह भी क्यों है ????

........अजीब से बातें अजीब से लोग अजीब सी दुनिया ....


















Devotee: Śrīla Prabhupāda, we understand that in the Satya-yuga one hundred percent of the population was God conscious. But then again, we see many times it is stated that, for example, there were always prostitutes or there was always this or...

Prabhupāda: No, there were no prostitute in Satya-yuga.

Devotee: No meat-eaters.

Prabhupāda: No meat-eaters.

Devotee: None whatsoever

Prabhupāda: All paramahaṁsas. In the Satya-yuga they are all paramahaṁsa.

Devotee: Every single person.

Prabhupāda: Every person was perfectly, spiritually...

Devotee 2: On the earth.

Prabhupāda: Yes. Then in Tretā-yuga one-fourth diminished. And then Dvāpara-yuga, half diminished. And in Kali-yuga, three-fourth diminished. Seventy-five per cent are all rogues, and twenty-five per cent... That is expected, but that is now diminishing. They are all rogues with the advancement of Kali-yuga. Mandāḥ sumanda-matayo manda-bhāgyā hy upadrutāḥ (SB 1.1.10). Therefore there is no other method to save them. Harer nāmaiva kevalam. This is Caitanya Mahāprabhu's gift. Incorrigible. Everyone will be incorrigible. Only hope is Hare Kṛṣṇa. The whole Vedic system is to make human being correct. Being incorrect, they are suffering in this material world repetition of birth, death. Sometimes man, sometimes dog. So to correct him so that he comes to his original position, Kṛṣṇa conscious, and go back to home. This is the whole Vedic civilization, to correct him.

Therefore it is called saṁskāra. Saṁskāra means correction. Saṁskārād bhaved dvijaḥ. Veda-pāṭhād bhaved vipro brahma jānātīti brāhmaṇaḥ.(?)To correct him and bring him to the brahminical stage. From pig stage to brahminical stage. This is Vedic civilization. Everyone is like pig in this material world. Therefore Ṛṣabhadeva says, "Now don't live like pig." Nāyaṁ deho deha-bhājāṁ nṛloke kaṣṭān kāmān arhate viḍ-bhujāṁ ye: (SB 5.5.1) "Now, you, My children... " He was advising, instructing His son that "Now this life is not to live like pig." This is the first instruction, because everyone is more or less pig, living like pig. Pig means he has no discrimination of eating and he has no discrimination of sex. That is pig. And everyone is like that. No discrimination of eating, especially in the Western. And no discrimination of sex. Pigs. Big pig or small pig, that's all. So Ṛṣabhadeva says, "Now My dear sons, don't spoil your life living like pigs." Nāyaṁ deho deha-bhājāṁ nṛloke. Nṛloke means "In the human society you should not live like pig and very hard labor."

So the whole civilization at the present moment they want to live like pig, and to live like pig they are working like an ass. And that is civilization, working like ass to become a pig. You tell them!

Srila Prabhupada Morning Walks January 22-23, 1976, Mayapura